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मासिक पत्रिका, August 2026 · सामाजिक मुद्दे › आरक्षण और क्रीमी लेयर
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OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) क्रीमी लेयर (creamy layer): मंत्रालयों के बीच अटकी आय कसौटी
मुख्य लेखप्रारंभिक और मुख्य29 Aug 2026
चर्चा में क्यों
- 29 अगस्त 2026 को अन्य पिछड़ा वर्ग कल्याण संबंधी संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee on the Welfare of Other Backward Classes) के अध्यक्ष ने कहा कि क्रीमी लेयर की आय कसौटी किस प्रकार लागू की जाए, यह प्रश्न कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन मंत्रालय (Ministry of Personnel) और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय (Ministry of Social Justice and Empowerment) के बीच "अटका हुआ लगता है", क्योंकि दोनों यह काम एक दूसरे पर डाल रहे हैं।
- उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने मार्च में निर्णय दिया था कि किसी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (public sector undertaking) या निजी कंपनी से मिलने वाला माता या पिता का वेतन अपने आप में किसी अभ्यर्थी को क्रीमी लेयर में नहीं डाल सकता, और अगस्त में केंद्र सरकार ने न्यायालय को बताया कि सरकार से बाहर के कौन से पद किन सरकारी पदों के समतुल्य हैं, यह तय करने में दो वर्ष लग सकते हैं; इस बीच सिविल सेवा परीक्षा (Civil Services Examination) उत्तीर्ण करने वाले अभ्यर्थी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

- ₹8 लाख प्रति वर्षवह सकल पारिवारिक आय जिससे ऊपर अभ्यर्थी क्रीमी लेयर में आता है, जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल (Union Cabinet) ने 30 अगस्त 2017 को ₹6 लाख से बढ़ाकर तय किया
- छह महीनेप्रभावित अभ्यर्थियों के दावों पर पुनर्विचार के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा मार्च 2026 में दिया गया समय
- दो वर्ष तकसभी राज्य सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में पदों की समतुल्यता (equivalence) तय करने के लिए केंद्र का अनुमान, जो अगस्त में न्यायालय को दिया गया
- 27 प्रतिशतइंद्रा साहनी (1992) के बाद से केंद्रीय भर्ती में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण
पृष्ठभूमि
- क्रीमी लेयर किसी पिछड़े वर्ग का सामाजिक और आर्थिक रूप से उन्नत हिस्सा है, जिसे आरक्षण से बाहर रखा जाता है ताकि लाभ उन तक पहुँचे जो अब भी पीछे हैं। उच्चतम न्यायालय ने इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) में इस अपवर्जन को OBC आरक्षण की शर्त बनाया, और कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (Department of Personnel and Training) ने 8 सितंबर 1993 के कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) में यह कसौटी निर्धारित की।
- 1993 की कसौटी आय पर नहीं, प्रस्थिति (status) पर आधारित है। संवैधानिक पदधारियों, समूह 'क' (Group A) अधिकारियों, 40 वर्ष की आयु से पहले समूह 'क' में पहुँचने वाले समूह 'ख' अधिकारियों, कर्नल और उससे ऊपर के अधिकारियों, तथा सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों, विश्वविद्यालयों और निजी क्षेत्र में समतुल्य पदों पर आसीन लोगों की संतानें बाहर रखी जाती हैं। आय और संपत्ति की कसौटी, यानी लगातार तीन वर्ष तक सीमा से अधिक आय, सेवा श्रेणियों से बाहर के लोगों के लिए थी।
- सीमा कीमतों के साथ बढ़ाई जाती रही है: 1993 में ₹1 लाख, 2004 में ₹2.5 लाख, 2008 में ₹4.5 लाख, 2013 में ₹6 लाख और 2017 में ₹8 लाख, जब मंत्रिमंडल ने अन्य पिछड़े वर्गों के उप-वर्गीकरण (sub categorisation) के लिए अनुच्छेद 340 के अंतर्गत एक आयोग भी गठित किया।
- विभाग के 2004 के स्पष्टीकरण में कहा गया था कि सीमा तक पहुँचने के लिए वेतन और कृषि से होने वाली आय को जोड़ा नहीं जाएगा। उसी वर्ष के एक पत्र ने, जिस पर विभाग बाद में निर्भर रहा, यह अनुमति दी कि जहाँ पदों की समतुल्यता तय नहीं हुई है वहाँ केवल वेतन से मामला तय हो, और इसी व्याख्या को न्यायालय ने मार्च में अस्वीकार किया।
कसौटी कैसे बिखरी
- कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले अभ्यर्थियों को क्रीमी लेयर में माना, क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और बैंकों से उनके माता पिता का वेतन ₹8 लाख से अधिक था; उन पदों के लिए सरकारी श्रेणियों से समतुल्यता कभी अधिसूचित नहीं हुई थी, इसलिए अकेली आय ने निर्णय किया। Central Administrative Tribunal और कई उच्च न्यायालयों ने अभ्यर्थियों के पक्ष में निर्णय दिया, और केंद्र ने अपील की।
- मार्च 2026 में न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने अपीलें खारिज कर दीं। पीठ ने माना कि 1993 का ज्ञापन प्रस्थिति आधारित योजना है, और आय केवल एक पूरक कसौटी है जहाँ समतुल्यता तय नहीं हुई है; वेतन, कृषि और अन्य आय को सीमा तक पहुँचने के लिए यांत्रिक रूप से जोड़ा नहीं जा सकता। सार्वजनिक क्षेत्र की किसी लिपिक की संतान को इसलिए बाहर करना कि उसका वेतन ₹8 लाख से अधिक है, जबकि उतने ही वेतन वाले समूह 'ग' सरकारी कर्मचारी की संतान भीतर बनी रहे, असमान और असंवैधानिक होगा।
- न्यायालय ने निर्देश दिया कि अभ्यर्थियों के दावों पर छह महीने के भीतर पुनर्विचार हो, और आवश्यकता हो तो अधिसंख्य पद (supernumerary posts) सृजित किए जाएँ।
समिति का मत
- स्थायी समिति ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय से सार्वजनिक निकायों में समतुल्य पदों की पहचान करने को कहा है, क्योंकि ऐसा न करने के कारण OBC अभ्यर्थियों को न्यायालय जाना पड़ता है, और सिफारिश की है कि सीमा में केवल वेतन और कृषि के अतिरिक्त अन्य स्रोतों की आय गिनी जाए, तथा सभी समूह 'ग' कर्मचारी भीतर रखे जाएँ।
- 29 अगस्त को अध्यक्ष की टिप्पणी अगले कदम के बारे में है: समतुल्यता और आय कसौटी पर एक नीति, जिसे सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय न्यायालय की व्याख्या के अनुसार मंत्रिमंडल के लिए तैयार करे। किसी भी मंत्रालय ने इसे तैयार नहीं किया है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
- जो कसौटी किसी लिपिक के वेतन को उन्नति मान लेती है, वह ठीक उसी पहली पीढ़ी को बाहर कर देती है जिसे ऊपर उठाने के लिए यह नीति है; दो मंत्रालयों के बीच के अंतराल के कारण चयनित अभ्यर्थी वर्षों तक न नियुक्त होते हैं, न अस्वीकृत।
- यही प्रश्न, कि क्या आय किसी सामाजिक अलाभ को माप सकती है, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के संबंध में न्यायालय के समक्ष है, जहाँ केंद्र के अगस्त के शपथपत्र का उत्तर है नहीं; दोनों स्थितियों को साथ पढ़ना होगा।
विश्लेषण
- निर्णय ने 2004 की सुविधा के विरुद्ध 1993 की रूपरेखा को बहाल किया। रूपरेखा यह थी कि वेतन नहीं, बल्कि पद और श्रेणी दिखाते हैं कि कोई परिवार पिछड़ेपन से निकल चुका है; आय कसौटी उन लोगों के लिए एक अस्थायी उपाय थी जिनके पास तुलना के लिए कोई श्रेणी नहीं थी।
- अस्थायी उपाय नियम बन गया। बीस वर्षों तक समतुल्यताएँ अधिसूचित न करने से आय कसौटी डिफ़ॉल्ट बन गई, और डिफ़ॉल्ट बैंक लिपिकों की संतानों को बाहर करने का साधन।
- भार अब वहीं है जहाँ उसे होना चाहिए, यानी समतुल्यताएँ तय करने का भार सरकार पर; उसका दो वर्ष और उससे अधिक का उत्तर दिखाता है कि यह काम कभी क्यों नहीं हुआ, क्योंकि यह थकाऊ है और हर मंत्रालय में किसी न किसी को नाराज़ करता है।
- मुख्य परीक्षा के लिए ईमानदार तर्क: इस कसौटी के लिए एक एकल प्रकाशित संहिता बहुत पहले बन जानी चाहिए थी, जिसमें बड़े नियोक्ताओं के लिए समतुल्यता तालिकाएँ हों और यह स्पष्ट नियम हो कि अकेला वेतन कभी बाहर नहीं करता।
- मंत्रिमंडल का एक निर्णय इसे एक दिन में सुलझा सकता है। जो प्रश्न "मंत्रालयों के बीच अटका" है, वह कानून का नहीं, इच्छाशक्ति का प्रश्न है।
आगे की राह
- मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित एक एकल कार्यालय ज्ञापन, जो मार्च के निर्णय को कसौटी में लिख दे: पहले प्रस्थिति, आय केवल सेवा श्रेणियों से बाहर के लोगों के लिए, और वेतन तथा कृषि आय कभी नहीं गिनी जाए।
- केंद्रीय और राज्य सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, बैंकों और बीमा कंपनियों के लिए निश्चित समय में समतुल्यता तालिकाएँ, और जब तक वे न बनें तब तक निजी क्षेत्र के लिए एक डिफ़ॉल्ट नियम।
- सिविल सेवा के लंबित मामलों का निर्णय न्यायालय के दिए छह महीनों के भीतर करना और परिणाम प्रकाशित करना।
जानने योग्य योजनाएँ
PM YASASVI (Pradhan Mantri Young Achievers Scholarship Award Scheme for Vibrant India, 2021-22 से, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय)
- OBC, आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग (Economically Backward Class) और विमुक्त जनजाति (Denotified Tribe) के विद्यार्थियों के लिए समग्र छात्रवृत्ति योजना, जिसके घटक हैं: प्री मैट्रिक, पोस्ट मैट्रिक, उच्च श्रेणी के विद्यालय और महाविद्यालय, तथा छात्रावास।
- पारिवारिक आय सीमा ₹2.5 लाख प्रति वर्ष।
- 2023-24 में पोस्ट मैट्रिक घटक लगभग 28 लाख विद्यार्थियों तक पहुँचा।
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (National Commission for Backward Classes) (102वें संविधान संशोधन, 2018 से अनुच्छेद 338B के अंतर्गत संवैधानिक निकाय)
- अपनी जाँचों में इसे सिविल न्यायालय (civil court) की शक्तियाँ प्राप्त हैं।
- पिछड़े वर्गों को प्रभावित करने वाली हर प्रमुख नीति पर इससे परामर्श अनिवार्य है।
परीक्षा दृष्टि
- प्रारंभिक परीक्षा: इंद्रा साहनी (1992): OBC के लिए 27 प्रतिशत, क्रीमी लेयर बाहर, 50 प्रतिशत की सीमा; 1993 के कार्यालय ज्ञापन की प्रस्थिति कसौटी; 30 अगस्त 2017 के मंत्रिमंडल निर्णय से आय सीमा ₹8 लाख; वेतन और कृषि आय नहीं गिनी जाती; राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के लिए अनुच्छेद 338B (102वाँ संविधान संशोधन, 2018); पिछड़े वर्गों पर आयोग के लिए अनुच्छेद 340।
- मुख्य परीक्षा: "क्रीमी लेयर की रूपरेखा प्रस्थिति की कसौटी के रूप में बनाई गई थी, पर इसे आय की कसौटी के रूप में लागू किया गया है।" उच्चतम न्यायालय के 2026 के निर्णय के आलोक में परीक्षण कीजिए कि सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की संतानों पर यह कसौटी कैसे लागू की जानी चाहिए।
पहले पूछा गया: मुख्य परीक्षा 2022 GS2 · प्रारंभिक परीक्षा 2023
प्रश्न देखें
- मुख्य परीक्षा 2022 GS2: Discuss the role of the National Commission for Backward Classes in the wake of its transformation from a statutory body to a constitutional body.
- प्रारंभिक परीक्षा 2023: Consider the following organizations/bodies in India: 1. The National Commission for Backward Classes 2. The National Human Rights Commission 3. The National Law Commission 4. The National Consumer Disputes Redressal Commission. How many of the above are constitutional bodies?
उद्धृत करने योग्य मामले
- इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992): क्रीमी लेयर के अपवर्जन की शर्त के साथ 27 प्रतिशत OBC आरक्षण बरकरार रखा गया।
- जरनैल सिंह बनाम लछमी नारायण गुप्ता (2018): क्रीमी लेयर का सिद्धांत पदोन्नति में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों पर लागू होता है।
- मार्च 2026 की क्रीमी लेयर अपीलें (न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन): अकेला वेतन क्रीमी लेयर की स्थिति तय नहीं कर सकता; 1993 की कसौटी प्रस्थिति आधारित है, और आय केवल पूरक।
संबंधित लेख
- अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों में क्रीमी लेयर: केंद्र का शपथपत्र (राजव्यवस्था, अगस्त): अनुसूचित जातियों के लिए इसी प्रश्न पर केंद्र का उत्तर।
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- विमुक्त, घुमंतू और अर्ध घुमंतू समुदाय (सामाजिक मुद्दे, सितंबर): वे समुदाय जो OBC और अनुसूचित जनजाति की सूचियों के बीच छूट जाते हैं।
स्रोत
- The Wire, 29 August 2026, “House panel chief says OBC creamy layer income test issue stuck between two ministries: report”
- Business Standard, 13 March 2026, “Creamy layer in OBC quota cannot be decided solely on parents' income: SC”
- PRS Legislative Research, “Rationalisation of Creamy Layer in Employment for OBCs”
- PMIndia, 30 August 2017
- PIB, 23 October 2024
स्थापित तथ्य (अधिनियमों की तिथियाँ, संवैधानिक प्रावधान, स्थायी परिभाषाएँ) मानक संदर्भ ग्रंथों से हैं।
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