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मासिक पत्रिका, July 2026 · राजव्यवस्था और शासन › प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद और मंत्रिमंडल प्रणाली
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अभिरक्षा में रखे गए मंत्री को हटाना: संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक (Constitution (130th Amendment) Bill) और संयुक्त समिति का विराम
मुख्य लेखप्रारंभिक और मुख्य17 Jul 2026
चर्चा में क्यों
- 17 जुलाई 2026 को, मानसून सत्र शुरू होने से तीन दिन पहले, संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक, 2025 पर संयुक्त संसदीय समिति (Joint Parliamentary Committee) अपनी रिपोर्ट स्वीकार करने के लिए बैठी, पर स्वीकार नहीं कर सकी।
- सदस्यों ने मसौदे की पाँच सिफ़ारिशों पर एक एक करके मतदान किया और फिर, अध्यक्ष के शब्दों में सर्वसम्मति से, सहमत हुए कि और परामर्श की आवश्यकता है; दो विपक्षी सदस्यों ने अपने दाखिल किए गए असहमति नोट वापस ले लिए, और अध्यक्ष ने कहा कि रिपोर्ट मानसून सत्र में नहीं आएगी।
- 20 अगस्त 2025 को पेश किया गया और उसी दिन समिति को भेजा गया यह विधेयक ऐसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री को पद से हटा देगा जिसने पाँच वर्ष या उससे अधिक की सज़ा वाले किसी आरोप में लगातार तीस दिन अभिरक्षा में बिताए हों।
- संविधान में अभी ऐसा कुछ नहीं है जो जेल में बंद मंत्री को पद छोड़ने के लिए बाध्य करे, और समिति ने जिस प्रश्न को टाला है वह यही है कि क्या संविधान को ऐसा करना चाहिए।

पृष्ठभूमि
- अनुच्छेद 75 और 164 कहते हैं कि प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर होती है, और मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं; यही बात मुख्यमंत्री और राज्यपाल पर लागू होती है। इनमें से किसी भी अनुच्छेद में ऐसा कुछ नहीं है जो गिरफ्तारी, आरोप या अभिरक्षा पर किसी मंत्री को निरर्हित करे।
- विधायिका से निरर्हता अलग विषय है: अनुच्छेद 102 और 191 तथा Representation of the People Act, 1951 की धारा 8 के तहत कोई सदस्य दोषसिद्धि और दो वर्ष या उससे अधिक की सज़ा होने पर निरर्हित हो जाता है, जैसा कि उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने लिली थॉमस (2013) में निर्णय दिया। कोई विचाराधीन कैदी (undertrial) निरर्हित नहीं होता।
- यह कमी 2024 में दिखी, जब दिल्ली के एक पदासीन मुख्यमंत्री धन शोधन (money laundering) कानून के तहत महीनों तक हिरासत में रहे और अभिरक्षा से ही पद पर बने रहे, और 1997 में, जब बिहार के एक मुख्यमंत्री ने गिरफ्तारी पर इस्तीफ़ा देकर अपने उत्तराधिकारी को बैठा दिया।
- विधेयक गृह मंत्री ने दो सहवर्ती विधेयकों के साथ पेश किया, एक केंद्र शासित प्रदेशों के लिए और एक जम्मू और कश्मीर के लिए, और तीनों को दोनों सदनों की एक संयुक्त समिति को भेजा गया।
विधेयक क्या करता है
- यह अनुच्छेद 75, 164 और 239AA में ऐसे खंड जोड़ता है जिनके तहत जो मंत्री पाँच वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय अपराध के आरोप में गिरफ्तार होकर लगातार तीस दिन अभिरक्षा में रखा जाता है, उसे प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति या राज्यपाल हटाएँगे, और यदि कोई सलाह नहीं आती तो वह इकतीसवें दिन पद पर नहीं रहेगा।
- इसी स्थिति में कोई प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री इकतीसवें दिन तक इस्तीफ़ा देगा, अन्यथा पद रिक्त हो जाएगा।
- दो सहवर्ती विधेयक यही नियम पुदुचेरी और जम्मू और कश्मीर पर लागू करते हैं।
पक्ष में तर्क
- अभिरक्षा में रहने वाला मंत्री पद के दायित्व नहीं निभा सकता, और जनता देखती है कि सरकार एक कोठरी से चल रही है; विधेयक उस बात को संवैधानिक रूप देता है जो पहले इस्तीफ़े की राजनीतिक परिपाटी करती थी।
- यह प्रधानमंत्री और संघ पर उतना ही लागू होता है जितना किसी मुख्यमंत्री पर, और हर दल पर।
- दोषसिद्धि पर आधारित निरर्हता उस मंत्री के लिए बहुत देर से आती है जिसके पास किसी विचारण को एक दशक तक टालने के साधन हों; इसी कारण कई आयोगों ने आरोप तय होने (framing of charges) पर निरर्हता का प्रस्ताव रखा है।
विपक्ष में तर्क
- संसदीय लोकतंत्र: केवल लोक सभा और विधान सभाएँ ही किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को बनाती और हटाती हैं; विधेयक एक जाँच एजेंसी को गिरफ्तार करके और हिरासत में रखकर वह करने देता है जो एक अविश्वास प्रस्ताव (no confidence motion) करता है।
- शक्तियों का पृथक्करण (separation of powers): एजेंसियाँ स्थायी कार्यपालिका (permanent executive) का हिस्सा हैं, और विधेयक के तहत वे किसी न्यायालय के कुछ भी निष्कर्ष निकाले बिना एक निर्वाचित सरकार को अपदस्थ कर सकती हैं, क्योंकि तीस दिन पर न्यायालय ने केवल गिरफ्तारी के आधारों और प्रक्रिया की जाँच की होती है, और डिफ़ॉल्ट जमानत (default bail) साठ या नब्बे दिन पर मिलती है।
- संघवाद (federalism): किसी केंद्रीय एजेंसी की गिरफ्तारी विपक्ष शासित राज्य के मुख्यमंत्री को हटा सकती है, और किसी राज्य पुलिस की गिरफ्तारी, सिद्धांततः, किसी केंद्रीय मंत्री को हटा सकती है।
- विधि का शासन (rule of law): संभावित दोष के किसी भी न्यायिक आकलन के बिना हटाना अभिरक्षा को ही प्रमाण मान लेता है, और निर्दोषता की उपधारणा (presumption of innocence) मंत्रियों पर भी उतनी ही लागू होती है जितनी किसी अन्य पर।
- उच्चतम न्यायालय ने मनोज नरूला (2014) में अनुच्छेद 75 में दागी मंत्रियों पर रोक पढ़ने से इनकार कर दिया, और मंत्रियों के चयन को प्रधानमंत्री का संवैधानिक परमाधिकार माना, जो किसी न्यायिक नियम से नहीं बल्कि संवैधानिक नैतिकता (constitutional morality) से सीमित है।
विश्लेषण
- सही परिणाम, गलत कारण से। समिति ने विराम इसलिए लिया कि सदस्य सहमत नहीं हो सके, इसलिए नहीं कि उन्होंने डिज़ाइन की उस समस्या को सुलझा लिया था कि विधेयक गिरफ्तारी को एक संवैधानिक घटना बना देता है।
- हटाने का हर दूसरा तरीका किसी निर्णय पर टिका है। एक मतदान, एक दोषसिद्धि या संसद का एक समावेदन; यह तरीका एक पुलिस अधिकारी के निर्णय और एक मजिस्ट्रेट के रिमांड पर टिका होगा, जिनमें से कोई भी दोष को नहीं तौलता।
- ईमानदार विकल्प पहले से अभिलेख में है। गंभीर अपराधों की एक सूचीबद्ध श्रेणी के लिए, अभियुक्त को सुनने के बाद, न्यायालय द्वारा आरोप तय किए जाने पर निरर्हता, जैसा कि आयोगों ने विधायकों के लिए प्रस्तावित किया था: एक न्यायिक ट्रिगर जो संघ और राज्यों पर समान रूप से लागू होता है।
- असली शिकायत। शिकायत यह नहीं है कि मंत्री गिरफ्तार होते हैं, बल्कि यह है कि उनका विचारण कभी नहीं होता; आरोप तय होने पर ट्रिगर इस शिकायत का समाधान करता है, गिरफ्तारी पर ट्रिगर नहीं करता।
- मुख्य परीक्षा के लिए: दोनों पक्षों को निष्पक्ष रूप से रखिए, मूल ढाँचे (basic structure) की उन चार विशेषताओं के नाम बताइए जिन्हें विधेयक द्वारा प्रभावित किया जाना बताया जाता है, और बताइए कि ट्रिगर कहाँ होना चाहिए।
आगे की राह
- अपराधों की एक सूचीबद्ध श्रेणी के लिए, ट्रिगर के रूप में अभिरक्षा के स्थान पर न्यायालय द्वारा आरोप तय किया जाना रखा जाए, और आदेश से पहले सुनवाई हो।
- इस्तीफ़े की परिपाटी बनी रहे, और प्रधानमंत्री तथा मुख्यमंत्री का परमाधिकार संवैधानिक नैतिकता के भीतर काम करे, जैसा कि मनोज नरूला ने कहा था।
- कोई भी नियम सममित रूप से लागू हो, और यह रोक रहे कि किसी केंद्रीय एजेंसी की गिरफ्तारी किसी राज्य के मंत्री को हटाने का एकमात्र आधार न बने।
- संयुक्त समिति के साक्ष्य प्रकाशित किए जाएँ, ताकि बहस इस पर टिके कि 42 संस्थाओं ने क्या कहा।
परीक्षा दृष्टि
- प्रारंभिक परीक्षा: अनुच्छेद 75 और 164, मंत्री राष्ट्रपति और राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं; अनुच्छेद 75(1A), मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) लोक सभा के 15 प्रतिशत तक सीमित (91वाँ संविधान संशोधन); Representation of the People Act, 1951 की धारा 8 के तहत दोषसिद्धि पर निरर्हता और लिली थॉमस (2013); संविधान संशोधन के लिए अनुच्छेद 368 के तहत विशेष बहुमत (special majority) आवश्यक है; विधेयक 20 अगस्त 2025 को पेश हुआ और उसी दिन संयुक्त समिति को भेजा गया।
- मुख्य परीक्षा: "किसी मंत्री का कार्यकाल मतदान या निर्णय से समाप्त होना चाहिए, गिरफ्तारी से कभी नहीं।" संसदीय लोकतंत्र, शक्तियों के पृथक्करण और संघवाद के आलोक में संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक, 2025 का परीक्षण कीजिए।
पहले पूछा गया: प्रारंभिक परीक्षा 2013 · प्रारंभिक परीक्षा 2022 · मुख्य परीक्षा 2026 GS2
प्रश्न देखें
- प्रारंभिक परीक्षा 2013: Consider the following statements: 1. The Council of Ministers in the Centre shall be collectively responsible to the Parliament. 2. The Union Ministers shall hold the office during the pleasure of the President of India. 3. The Prime Minister shall communicate to the President about the proposals for legislation. Which of the statements given above is/are correct?
- प्रारंभिक परीक्षा 2022: Consider the following statements: 1. The Constitution of India classifies the ministers into four ranks viz. Cabinet Minister, Minister of State with Independent Charge, Minister of State and Deputy Minister. 2. The total number of ministers in the Union Government, including the Prime Minister, shall not exceed 15 percent of the total number of members in the Lok Sabha. Which of the statements given above is/are correct?
- मुख्य परीक्षा 2026 GS2: Examine how the separation of powers is practised in India compared to the rigid presidential model of the United States of America. In this context, compare the actual authority of the Indian Prime Minister with that of the President of the USA.
उद्धृत करने योग्य मामले
- मनोज नरूला बनाम भारत संघ (2014): अनुच्छेद 75 में आरोपों का सामना कर रहे व्यक्तियों के मंत्री बनने पर कोई रोक नहीं पढ़ी जा सकती; चयन प्रधानमंत्री का है, जो संवैधानिक नैतिकता से निर्देशित हो।
- लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013): कोई विधायक दोषसिद्धि और दो वर्ष या उससे अधिक की सज़ा होते ही तुरंत निरर्हित हो जाता है।
- केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973): संसद की संशोधन शक्ति मूल ढाँचे तक विस्तारित नहीं होती।
- दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार बनाम भारत संघ (2023): जवाबदेही की तिहरी शृंखला (triple chain of accountability), सिविल सेवकों से मंत्रियों तक, मंत्रियों से विधायिका तक और विधायिका से जनता तक।
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- संसद ने कैसे काम किया: 2026 का मानसून सत्र (राजव्यवस्था, अगस्त): वह सत्र जिस तक रिपोर्ट नहीं पहुँची।
स्रोत
- PRS Legislative Research
- News Arena India, 17 July 2026, “JPC defers adoption of report on bill to remove PM, CMs”
- The Wire, 17 July 2026
- Deccan Herald, 1 July 2026
स्थापित तथ्य (अधिनियमों की तिथियाँ, संवैधानिक प्रावधान, स्थायी परिभाषाएँ) मानक संदर्भ ग्रंथों से हैं।
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