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आंतरिक सुरक्षा › पुलिस और आपराधिक न्याय
English — अंग्रेज़ी में पढ़ेंहिरासत में हिंसा और जवाबदेही
पुलिस और न्यायिक हिरासत में मौतें और यातना, कानून द्वारा तय सुरक्षा उपाय, और अधिकारियों की जवाबदेही कैसे तय होती है।
पहले पूछा गया
- प्रारंभिक परीक्षा 2026: 'X' was addressing a seminar on the meaning of the term 'law' as provided under Article 13, Part III of the Constitution of India. 'X' ex…
- प्रारंभिक परीक्षा 2026: Which of the following statements about a Zero First Information Report (Zero FIR) under the Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (BNSS), 2…
- प्रारंभिक परीक्षा 2025: Consider the following pairs : Provision in the Constitution of India : Stated under. I. Separation of Judiciary from the Executive in th…
- मुख्य परीक्षा 2025 GS4: It is said that for an ethical work culture, there must be code of ethics in place in every organisation. To ensure value-based and compl…
- मुख्य परीक्षा 2025 GS4: India is an emerging economic power of the world as it has recently secured the status of fourth largest economy of the world as per IMF…
- प्रारंभिक परीक्षा 2024: Under which of the following Articles of the Constitution of India, has the Supreme Court of India placed the Right to Privacy?
- प्रारंभिक परीक्षा 2024: A Writ of Prohibition is an order issued by the Supreme Court or High Courts to:
- मुख्य परीक्षा 2024 GS4: The 'Code of Conduct' and 'Code of Ethics' are the sources of guidance in public administration. There is code of conduct already in oper…
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हिरासत में मौत (custodial death) और BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के सुरक्षा उपाय
Copy link to हिरासत में मौत (custodial death) और BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के सुरक्षा उपायमानकप्रारंभिक और मुख्य12 Aug 2026
यह क्या है
- हिरासत में मौत पुलिस या न्यायिक हिरासत में किसी भी कारण से हुई मृत्यु है, और राज्य हर ऐसी मृत्यु के लिए उत्तरदायी है क्योंकि हिरासत में रखा व्यक्ति अपनी रक्षा स्वयं नहीं कर सकता। डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) ने गिरफ्तारी और निरोध के लिए गिरफ्तारी ज्ञापन (arrest memo) से लेकर चिकित्सा परीक्षण तक ग्यारह अपेक्षाएँ निर्धारित कीं, और उनके उल्लंघन को न्यायालय की अवमानना (contempt of court) बनाया।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) इसका बड़ा भाग क़ानून में लिखती है: धारा 47 (गिरफ्तारी के आधार), धारा 48 (सूचित किया जाने वाला व्यक्ति), धारा 53 (गिरफ्तारी पर चिकित्सा परीक्षण), धारा 58 (24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी) और धारा 196 (हिरासत में हर मृत्यु की, पुलिस जाँच के अतिरिक्त, न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच)।
- अपने दिशानिर्देशों के अनुसार राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission) को हिरासत में हर मृत्यु की सूचना 24 घंटे के भीतर दी जानी चाहिए, और वह मुआवज़े की सिफ़ारिश करता है; उसकी सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं हैं।
- मार्च 2026 में संसद को बताया गया कि आयोग को सूचित हिरासत में मौतें 2021-22 में 176, 2022-23 में 163, 2023-24 में 157 और 2024-25 में 140 थीं, तथा 2026 के पहले 74 दिनों में 170, जिनमें सबसे अधिक बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से थीं।
क्या हुआ
- 12 अगस्त 2026 को लहरा बाई तमरे बनाम छत्तीसगढ़ राज्य में उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने हिरासत में हुई एक मृत्यु की जाँच Central Bureau of Investigation को सौंप दी और परिवार को ₹25 लाख अंतरिम मुआवज़ा देने का आदेश दिया, जबकि उच्च न्यायालय (High Court) ने ₹1 लाख दिए थे।
- वह व्यक्ति, एक दुकानदार जिसे 18 जनवरी 2024 को ₹1,200 की शराब के मामले में गिरफ्तार किया गया था, तीन दिन बाद मर गया। जुलाई 2024 में न्यायिक मजिस्ट्रेट की जाँच में पाया गया कि उसकी मृत्यु किसी कुंद हथियार से सिर में लगी चोट से हुई, फिर भी पुलिस ने 30 जुलाई 2026 तक कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट (First Information Report) दर्ज नहीं की, और राज्य के पुलिस प्रमुख ने न्यायालय से कहा कि जाँच रिपोर्ट कभी पुलिस तक पहुँची ही नहीं, जबकि वह उच्च न्यायालय में राज्य के अपने शपथपत्र के साथ संलग्न थी।
- न्यायालय ने कहा कि अनभिज्ञता का यह दावा अस्वीकार्य है, देरी को हिरासत में हिंसा (custodial violence) पर पर्दा डालने का प्रयास बताया, और ब्यूरो से उन अधिकारियों से पूछताछ करने को कहा जो रिपोर्ट दबाकर बैठे रहे।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
- यह मामला दिखाता है कि सुरक्षा उपाय काग़ज़ पर काम करते हैं और व्यवहार में विफल होते हैं: मजिस्ट्रेट की जाँच हुई और उसमें हिंसा पाई गई, और न्यायालय के हस्तक्षेप तक दो वर्ष कुछ नहीं हुआ। कमज़ोर कड़ी जाँच नहीं, बल्कि यह है कि पुलिस उसके साथ क्या करती है।
- धारा 187 के अंतर्गत खंडों में हिरासत, जिसकी अनुमति न्यायालय ने उसी सप्ताह दी, वह अवधि बढ़ाती है जिसमें किसी व्यक्ति को पुलिस के पास वापस भेजा जा सकता है; हर रिमांड की मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच ही वह सुरक्षा उपाय है जिस पर न्यायालय भरोसा कर रहा है।
- नीलाबती बेहरा (1993) से लेकर अब तक अनुच्छेद 32 के अंतर्गत मुआवज़ा ही वह एक उपचार है जो बढ़ा है; अधिकारियों पर अभियोजन अब भी दुर्लभ है, और कोई क़ानून अभी तक हिरासत में यातना को अलग अपराध नहीं बनाता, जैसा 2010 के Prevention of Torture Bill ने प्रस्तावित किया था।
परीक्षा दृष्टि
- प्रारंभिक परीक्षा: डी.के. बसु (1997), ग्यारह अपेक्षाएँ; BNSS की धाराएँ 47, 48, 53, 58 और 196; NHRC (राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग) को 24 घंटे में सूचना का नियम; अनुच्छेद 32 के अंतर्गत मुआवज़े पर नीलाबती बेहरा (1993)।
- मुख्य परीक्षा: सुरक्षा उपायों के बावजूद हिरासत में हिंसा क्यों बनी रहती है, और कौन सा संस्थागत परिवर्तन, यातना क़ानून, स्वतंत्र जाँच, बॉडी कैमरे, इसका समाधान करेगा।
पहले पूछा गया: प्रारंभिक परीक्षा 2021 · मुख्य परीक्षा 2021 GS2
प्रश्न देखें
- प्रारंभिक परीक्षा 2021: With reference to India, consider the following statements: 1. Judicial custody means an accused is in the custody of the concerned magistrate and such accused is locked up in police station, not in jail. 2. During judicial custody, the police officer in charge of the case is not allowed to interrogate the suspect without the approval of the court. Which of the statements given above is/are correct?
- मुख्य परीक्षा 2021 GS2: Though the Human Rights Commissions have contributed immensely to the protection of human rights in India, yet they have failed to assert themselves against the mighty and powerful. Analyzing their structural and practical limitations, suggest remedial measures.
संबंधित लेख
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत खंडों में पुलिस हिरासत (राजव्यवस्था, अगस्त): वह लंबी अवधि जिसमें पुलिस हिरासत माँग सकती है।
- निवारक निरोध और अभ्यावेदन का अधिकार (राजव्यवस्था, अगस्त): हिरासत में व्यक्ति के अधिकारों पर अगस्त का दूसरा निर्णय।
- Police Modernisation Mission (आंतरिक सुरक्षा, सितंबर): कैमरों, फोरेंसिक और प्रशिक्षण के लिए वह धन जिसकी इस सुधार को आवश्यकता है।
स्रोत
- LiveLaw, August 2026, “Supreme Court orders CBI probe into Chhattisgarh custodial death, grants ₹25 lakh compensation to kin”
- LiveLaw, August 2026
- Maktoob Media, 25 March 2026, “170 custodial deaths reported in first 74 days of 2026, Union govt tells Parliament”
स्थापित तथ्य (अधिनियमों की तिथियाँ, संवैधानिक प्रावधान, स्थायी परिभाषाएँ) मानक संदर्भ ग्रंथों से हैं।
केस स्टडी के रूप में पढ़ें: A death in police custody
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